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भूमि का चुनावः
चना की खेती विभिन्न प्रकार की मृदाओं जैसे बलुई, दोमट से गहरी दोमट में सफलतापूर्वक की जा सकती है। उचित जल निकास तथा मध्यम उर्वरता वाली जिसका पी.एच. मान 5.5-6.0 हो । चने की अच्छी फसल लेने के लिए सर्वथा उपयुक्त होती है। (अधिक उपजाऊ भूमि में चना के पौधों में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है व फसल में फूल व फल कम लगते हैं।)

असिंचित व बारानी क्षेत्रों मे चना की खेती के लिए चिकनी दोमट भूमि उपयुक्त है। रबी ऋतु की फसल होने के कारण इसे मानसून से संरक्षित नमी में बारानी क्षेत्रों में उगाया जाता है। हल्की ढलान वाले खेतों में चना की फसल अच्छी होती है। ढेलेदार मिट्टी में देशी चना की भरपूर फसल ली जा सकती है।

भूमि की तैयारी

चना की फसल मृदा वातन के लिए एक अत्यधिक संवेदनशील फसल है। भूमी या खेत की सतह सख्त या कठोर होने पर अंकुरण प्रभावित होता है एवं पौधे की वृद्धि कम होती है। इसलिए, मृदा वायु संचारण को बनाए रखने के लिए जुताई की आवश्यकता होती है। मिट्टी की एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के उपरान्त एक जुताई विपरीत दिशा में हैरो या कल्टीवेटर द्वारा करके पाटा लगाना पर्याप्त है। जल निकास का उचित प्रबंधन भी अति आवश्यक है। एक फसलीय क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में खेतो में गहरी जुताई संस्तुत की जाती है जिससे भूमि में रबी फसल के लिए पर्याप्त जल संचय हो सके। चना के लिए खेत की मिट्टी बहुत ज्यादा महीन या भुरभुरी नही होनी चाहिए तथा न ही बहुत ज्यादा दबी हुई। अच्छी खेती के लिए भूमि की सतह ढीली और ढेलेदार होनी चाहिए। बड़े ढेलों को तोड़ने तथा खेत को समतल बनाने एवं नमी संरक्षक के लिए पाटा लगाना चाहिए। बारानी भूमी मे मृदा नमी संरक्षण के उचित प्रबंधन भी अपनाने चाहिए।