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पोषक प्रबन्धन
चना की अधिक उत्पादकता लेने हेतु पर्याप्त एवं संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों की आपूर्ति करना आवश्यक है। मृदा गुणवत्ता या मृदा स्वास्थ्य को बनाएँ रखने एवं टिकाऊ ऊपज लेने हेतु उर्वरकों का उचित प्रबन्धन सही मात्रा में, सही समय पर, सही तरीके से देना अति महत्वपूर्ण है। चना हेतु उर्वरकों की आवष्यकता वहाँ की मृदा उर्वरता, मृदा नमी, प्रजातियाँ, पौधों के वृद्धिकाल, ऊपज एवं अवशेष निस्तारण इत्यादि कारकों पर निर्भर करती है। इसके अलावा पूर्ववर्ती फसल द्वारा पोषक तत्वों के दोहन द्वारा पोषक तत्वों की आवश्यकता प्रभावित होती है।
चना के दानों में प्रोटीन की भरपूर मात्रा पाई जाती है। अतः नत्रजन की मात्रा का मृदा से ह्यस अधिक होता है, जिसकी आपूर्ति वायुमण्डल में उपस्थित नत्रजन के स्थिरीकरण द्वारा पौधा अपनी पूर्ति कर लेता है। अतः बाह्य स्रोत द्वारा प्रारंभिक अवस्था में आरम्भक (स्टार्टर) के रूप में 15-20 किग्रा./हे. की दर से नत्रजन की आवश्यकता होती है। चना की अच्छी फसल लेने हेतु संस्तुत उर्वरकों की मात्रा इस प्रकार है।

  • देशी चना की पछेती बुआई की दशा में 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 30 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश व 20 कि.ग्रा. गंधक का उपयोग करना चाहिए।
  • देशी चना की बारानी क्षेत्रों में समय से बुआई के लिए 20 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस, व 20 कि.ग्रा. गंधक का उपयोग करना चाहिए।
  • सिंचित क्षेत्र देशी चना की समय से बुआई की दशा में 20 कि.ग्रा. नत्रजन, 60 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश व 20 कि.ग्रा. गंधक का उपयोग करना चाहिए।

बुआई से पहले कूंडों में उर्वरक की पूरी मात्रा प्रयोग करना लाभप्रद होता है। जिन क्षेत्रों में जस्ता की कमी पाई जाती है वहाँ 20 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। चने की खड़ी फसल में फूल आने व फलियां बनने की अवस्था में 2 प्रतिशत यूरिया या डी.ए.पी. के घोल का छिड़काव से उपज में वृद्धि होती है। चने की फसल सिंचित अथवा देर से बुवाई की दशा में 2 प्रतिशत यूरिया या डी.ए.पी. के घोल का फूल आने के समय छिड़काव करें।