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बुआई की विधि

बुवाई हल के पीछे कूँड़ में करनी चाहिए।  भारी मृदा एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा से अरहर के पौधे गल जाते हैं और प्रति इकाई क्षेत्र में पौधो की संख्या बहुत कम हो जाती है फलस्वरूप उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। ऐसे क्षेन्नों में अरहर की बुआई 45-60 से.मी. की दूरी पर बनी मेंड़ों पर करने से पैदावार में वृद्धि होती हैं।

पंक्ति से पंक्ति की दूरीः 

  • अगेती अरहर                                           -    60-75 सेमी. 
  • मध्यम अवधि व देर से पकने वाली अरहर   -    75-90 से.मी. 
  •  रबी-पूर्व अरहर                                           -    30-40 सेमी.  

पौधे से पौधे की दूरीः 

  • अगेती अरहर                           -    10-15 सेमी. 
  • मध्यम व दीर्घकालीन अरहर      -    20-25 से.मी. 
  • रबी-पूर्व अरहर                         -    8-10 सेमी.  

मेड़ों पर बुआई करने से सिंचाई में पानी की मात्रा में 25-30 प्रतिशत तक की बचत होती है। कूॅड़ों/नाली द्वारा जल के अच्छे निकास से पौधों की बढ़वार अच्छी होती है, फाइटोफ्थोरा बीमारी का प्रकोप कम होता है तथा पौधों की वांछित संख्या बनी रहती है। 


बुआई का समय 

शीघ्र पकने वाली प्रजातियों की बुवाई मध्य जून तक कर देनी चाहिए जिससे अरहर की फसल नवम्बर तक पक जाएं और गेहूँ की बुवाई सुविधानुसार की जा सके। मध्यम एवं देर से पकने वाली अवधि की प्रजातियों की बुवाई मानसून आने पर जुलाई के प्रथम पखवाड़े में करनी चाहिए। प्रजाति बहार एवं पूसा 9 की बुवाई पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में सितम्बर के पहले सप्ताह (रबी पूर्व) में की जा सकती है। ध्यान रहे कि देर से बुवाई करने पर बीज दर दुगुनी कर देनी चाहिए।