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मसूर आधारित फसल प्रणलियाँ
इसकी प्रचलित फसल प्रणालियाँ खरीफ परती-मसूर, मक्का-मसूर, चारा-मसूर, धान-मसूर है। सामान्यतः मसूर के साथ अलसी, जौ और सरसों की मि़श्रत खेती  भी की जाती है। 
सहफसली पद्वति में मसूर व सरसों की बुवाई 8:2 एवं मसूर व अलसी की बुवाई 4:2 पंक्तियों के अनुपात में करनी चाहिए। शरदकालीन गन्ने की दो पंक्तियों (2 फीट की दूरी) के मध्य एक पंक्ति मसूर की खेती की संस्तुति की जाती हैं। गन्ने के साथ मसूर की अन्तःफसली खेती करने से मसूर की जड़े वायुमण्डल से नाइट्रोजन स्थिरीकरण करती है जिससे गन्ने की फसल के बढ़वार व पैदावार में वृद्धि होती है। मृदा की उर्वरा शक्ति में बढ़ोत्तरी होती है एवं अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है।

फसल चक्र

मसूर की खेती में फसल चक्र का विशिष्ट योगदान है, अतः किसानों को मसूर का अच्छा उत्पादन लेने के लिए फसल चक्र अवश्य ही अपनाना चाहिये। एक ही खेत में लगातार मसूर बोने से जड विगलन व उकठा की बीमारी बहुत तेजी से फैलती है, जिससे फसल का नुकसान होता है तथा उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।