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मांहू

मसूर की फसल पर उत्तर पूर्वी और मध्य भारत के क्षेत्रों में जनवरी के महीने में तापमान सामान्य से अधिक होने की स्थिति में ही मांहू का प्रकोप होता है। मांहू पौधों के तने, पत्तियों और फलियों का रस चूस कर फसल को क्षतिग्रस्त करते हैं। बड़े क्षेत्रफल में बरानी मसूर की खेती में माहॅू कीट के अनियंत्रित प्रकोप से पैदावार में 70-80 प्रतिशत तक नुकसान हो सकता है। मांहू के जीवन चक्र में तीन अवस्थाए-अण्डा, शिशु और प्रौढ़ पायी जाती है। जिसमें शिशु और प्रौढ़ अवस्था क्षति कर होती है। शिशु हल्के भूरे रंग की होती है और प्रौढ़ चमकदार काले रंग की होती है।

लक्षण

  • माहू के शिशु और प्रौढ़ पौधों के कोमल पत्तियॉ, तनों, फूल व फलियों से रस चूस कर पौधों को कमजोर कर देते है जिससे पौधें मुरझा कर सूख जाते है फलियॉ सिकुड़ जाती है और फलियों में दानें नहीं बनते है। 
  • इसका प्रकोप दिसम्बर माह के अन्तिम सप्ताह से मार्च के प्रथम सप्ताह तक होता है।

प्रबन्धन

माहॅू के प्रबंधन के लिए सर्वप्रथम फसल का नियमित निरीक्षण कर मांहू या किसान मित्र कीट की संख्या की आंकलन जरूरी हैं।

 

  • खेत से खरपतवार को निकाल दें। 
  • माहॅू समूह जिस शाखा को क्षति करता है उसे शाखा सहित काट कर नष्ट कर दें।
  • माहूॅ मधुस्त्राव करती है जिसको चीटियॉ खाती है और माहॅू को किसान मित्र कीट से बचाती है। इसलिए चिटियों को नष्ट कर दें।
  • नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से माहॅू की क्षति और संख्या वृ़द्ध में सहायक होती है। इसलिए नाइट्रोजन को कम मात्रा में प्रयोग करें।
  • माहॅू के नियंत्रण में किसान मित्र कीट जैसे परभक्षी (लेडी वर्ड बीटिल, सिरफिड फ्लाई एवं डेमसेक बग) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है इसलिये जो सभी प्रकार के कीड़ों को मार दे उस प्रकार के कीटनाशी (आर्गेनोफास्फेट, कार्बामेंट और पायराथ्रोएट्स) का छिड़काव न करें।
  • 2 प्रतिशत फोरेट से बीज उपचार करे या 1 किग्रा फोरेट प्रति हेक्टेयर की दर से मिटटी में मिलायें ।
  • डाइमेंथोएट 30 ई.सी. (400 ग्रा. सक्रिय तत्व/ली.) 500-600 ली./हे. की दर से छिड़काव करें या 0.5 प्रतिशत मेटामिक्स्टाक्स ऑक्सीडिमेटान 600.800 लीण्ध्हेक्टेयर की दर से छिड़काव करे या फेनवलरेट (0.02) का छिड़काव करें या साइपरमेथ्रिन (0.004) छिड़काव करें।
  • 10 से 12 दिन पश्चात यह छिड़काव करे