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पर्ण व्यांकुचन रोग (लीफ क्रिंकल)

पर्ण व्याकुंचन रोग मूँग का एक महत्वपूर्ण विषाणु जनित रोग है। इस विषाणु द्वारा संक्रमित पौधों में नाम मात्र की फलियाँ आती हैं। यह रोग मूँग होता है। पर्ण व्यांकुचन रोग एक विषाणु द्वारा होता है। जिसका संचरण रोगी पौधें के बीजों द्वारा मुख्य रुप से होता है। कुछ क्षेत्रों में इस रोग का संचरण कीटों जैसे मांहू व सफेद मक्खी द्वारा होता है। 

सामान्यतः फसल बोने के तीन-चार सप्ताह बाद दूसरी पत्ती सामान्य से बडी होना इस रोग के लक्षण है। 

बाद में इन पत्तियों में झुर्रियां या मरोड़पन एवं पत्तियों की सामान्यता से अधिक वृ़द्ध होना इस रोग के विशिष्ट लक्षण है। ऐसी पत्तियां छूने पर सामान्यतः पत्ती से अधिक मोटी तथा खुरदरी होती हैं। इस लक्षण द्वारा रोगी पौधों  को खेत में दूर से ही पहचाना जा सकता है। 

जब रोगी पौधों में फूल की पुष्पकलिकाएं छोटी ही रहती है तथा इस के वाहृय दल सामान्य से मोटे तथा अधिक हरे हो जाते है। अधिकतर पुष्पक्रम गुच्छे की तरह दिखाई देता है व अधिकतर पुष्प कलियां परिपक्व होने से पहले ही गिर जाती हैं। कभी-कभी सभी पुष्प कलिकाओं के गिर जाने पुष्पक्रम एक डन्डी जैसा दिखता है। 

इस विषाणु के संक्रमण से पुष्प कलिकाओं में पराग कण बाध्य हो जाते है जिससे रोगी पौधों में फलियाँ कम लगती हैं। 

फसल पकने के समय तक भी पर्ण व्यांकुचन संक्रमित पौधे हरे ही रहते हैं। 

पर्ण व्याकुंचन के साथ-साथ पौधे पीली चितेरी रोग से भी संक्रमित हो सकते हैं।

 

रोग का प्रबंधन 

 

यह विषाणु रोगी पौधे के बीजों द्वारा संचारित होता है इसलिये रोगी पौधों को शुरु में ही उखाड़कर जला देना चाहिए। 

ऐसे क्षेत्र में जहां इस रोग का प्रकोप अधिक हो पर्ण व्यांकुचन अवरोधी प्रजातियों का चयन करना चाहिए । 

इस रोग का संचरण कीटों जैसे माहू व सफेद मक्खी द्वारा होता है इसलिये कीटों का नियंत्रण करके इस रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। खेत में रोग के लक्षण दिखते ही या बुवाई के 15 दिनो के पश्चात इमीडाक्लोपरीड 0.1 प्रतिशत (10 मिली. प्रति 10 लीटर पानी) या डायमेथोएट 0.3 प्रतिशत (30 मिली. प्रति 10 लीटर पानी) का फसल पर छिड़काव करें। इन कीटनाशियों का दूसरा छिडकाव बुवाई के 45 दिनों के पश्चात करने से इस रोग का प्रकोप कम किया जा सकता है।