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खरपतवार प्रबंधन
उर्द की बुवाई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। इसलिए पहली निराई बुवाई के 20-25 दिन के अन्दर तथा दूसरी आवश्यकतानुसार करनी चाहिए। फसल की बुवाई के तुरन्त पश्चात (अंकुरण से पहले) खरपतवारनाशी रसायन जैसे पेन्डीमेथिलीन का 2.5 से 3 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करने से 4-6 सप्ताह तक खरपतवार नहीं निकलते हैं। घास तथा चौंड़ी पत्ती वाले खरपतवार को रासायनिक विधि से नष्ट करने के लिए फ्लूक्लोरालिन (45 ई.सी़) नामक रसायन की 2.22 लीटर मात्रा को आवश्यक पानी में घोल बनाकर या प्रति हेक्टेयर एलाक्लोर की 4 लीटर मात्रा को 800 लीटर पानी में मिलाकर बुवाई के तुरंत बाद या अंकुरण से पहले छिड़काव कर देना चााहये। उपरोक्त के संभव न होने की स्थिति में 20 -25 दिन के पश्चात एक निराई अवश्य करा देनी चाहिए इससे भूमि में वायु संचार होने लगता है तथा जड़ों का विकास अच्छा होता है।

खरपतवार नियंत्रण के उपायः-

1. खरपतवार के बीजों से रहित बीजो का चयन

2. प्रदूषित जैविक उर्वरक के प्रयोग से बचे ।

3. खेत के आस पास खाली पड़ी जमीन की साफ साफाई

4. खेत की अन्य कृषि पारदार्थो व प्रक्रिया के साथ खरपतवार को आने से रोकें ।

5. फार्म यन्त्रों कृषि यंत्रों द्वारा खरपातवार के फैलाव को रोकना  

खरपातवार से बचाव की पारम्परिक तकनीके :-

1 शस्य क्रियाये :-  ये विधियाँ परिस्थितकीय हैं तथा खरपातवार के स्थान पर फसल की बढकर  (विकास) के लिये लाभकारी है।

 

फसल चक्र :-

उचित फसल चक्र का चुनाव करके विभिन्न खरपतवारों की संख्या व रोगों से बचाव किया जा सकता हैं।

 

पौधों की उचित संख्या (घनत्व) :- 

अच्छे फसल जमाव के लिये सही मात्रा में बीज का प्रयोग करें ताकि अच्छी उपज हों। फसल घ्नत्व होने पर  (पौधों की अधितम संख्या) होने पर खरपतवार को बढना व फलने फूलने का मौका नही मिलता है।

सहफली खेती :- 

सहफली खेकती को एक महत्वपूर्ण उपाय के रूप् में अपनाया जा सकता है जिससे खरपातवार की समस्या को दूर किया जा सकता है। इस विधि से पौधों की उचित कैनापी  पौधों की र्शीर्ष रचना बनती है पत्तियों का एक बड़ा क्षेत्रफल तैयार होता ळ।फ। कम अवधि की उचित विकसित होने वाली फसलों को लम्बी आवधि व ऊँचि फसलों के बीच में खरपातवार को विकसित होने से रोका जा सकता है बौर इससे खरपातवार केनिंयत्रण के उपायों में बचात की जा सकती ह। । प्रमुख सहफली खेती के उदाहरण है- मसूर प्लस अलसी ,गेहूँ-मसूर तथा गन्ना-मसूर 

 

मृदा सौर्यीकरण :-

मृदा सौर्यीकरण उक रसायन रहित खरपातवार नियंत्रण की तकनीक ह।। इस नवीन तकनीक की माँग सम्पूर्ण विश्व में न केवल खरपातवार बल्कि कीट नियंत्रण में भी बढ़ी है। इस विधि में प्रयुक्त होने वाले विभिन्न पदार्थो की  अपेक्षा पारदर्शा पालीइथइलीन की चादर खरपातवार नियंत्रण के बेहतर परिणाम देती है। यह विधि उन क्षेत्रों के लिये अधिक लाभदायी है जहाँ ग्रीष्म ऋतु में लगभग 45 डिग्री सेलसियस तक तापमान पहुच जाता है  प्लास्टिक सीट के उपयोग से प्रकाश की दीर्घ तरंगे वापस नही जा पाती हैं और आर्द्रता की भी कमी नही होती है । इस प्रकिया के द्वारा मृदा की ऊपरी सतह का तापमान 55 डिग्री सेलसियस तक बढाया जा सकता है जो कि अधिकांश - खरपातवार के बीज व बीजाणुओं को मार देता है। सामान्यताः गर्म मौसम में 4-6 सप्ताह की यह प्रक्रिया अधिकांश खरपातवारों का नियंत्रण कर देती है।

 

(3) याँत्रिक खरपातवार नियंत्रण :-

मुख्य फसल की अपेक्षा खरपातवार के नये पौधे जल्दी निकल आते है अतः यांत्रिक खरपातवार नाशी का प्रयोग किया जा सकता है किन्तु आवश्यक है कि रोपाई या खरपातवार नाशी यंत्रो की संरचना इस प्रकार की हो ि कवे मृदा को गहटी निचली पर्त को प्रभावित न करे बुवाई के उच्च सप्ताह उपरान्त दलहनी फसलों में यह प्रयोग किया जा  सकता है क्योंकि इस दौरान मुख्य फसल को खरपातवारों का सामना करना पड़ता है। आजकल कई प्रकार के यंत्रिक खरपातवार नाशी कि पहिये , इैल या ट्रैक्टर द्वारा संचालित है, उपलब्ध है।

 

 

श्रासायनिक खरपातवार :-

ये रसायन मुख्य फसल की बढत विकास को रोके बिना खरपातवार को प्रकार होने से रोकते हैं। समय से निकाई करने के लिये मजदुरों का न मिलना , हाथ से निकाई में व्यय अधिक होना , कम प्रभावी होना तथा विपरीत मृदा दव मौसम की परिस्थितियों में सम्भाव न हो पाय आदि कुछ ऐसे प्रमूख कारण हैं जिसकी वजह से कृषक हल के कुछ वर्षो से खरपातवार नाशी रसायनारे के प्रयोगको प्राथमिकता दे रहे हैं। अतः रसायन का प्रयोग , यॉत्रिक व मानवीय खरपातवार नियंत्रण के उपाय के विकल्प के रूप् में सामने आया है। कुछ प्रमुख ासायनों के विषय में जानकारी प्रस्तुत तालिका में दी जा रही है।