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भारत में चना का कुल क्षेत्रफल 79.7 लाख हेक्टेयर, उत्पादन 70.6 लाख टन तथा उत्पादकता 885 कि.ग्रा./ हेक्टेयर है।

चना की खेती बलुई दोमट भूमि से लेकर दोमट तथा मटियार भूमि में की जा सकती है। असिंचित व बारानी क्षेत्रों में चना की खेती के लिए चिकनी व चिकनी दोमट भूमि उपयुक्त है।

डी.सी.पी. 92-3, के.डबलू.आर. 108, जे.जी. 315, जे.जी. 16, जे.जी. 730, पन्त जी.186 , हरियाणा चना 1, पूसा 372, आर.एस.जी. 888, फुले जी. 95311, जी.एन.जी. 1581 तथा जे.जी. 74 चना की उकठा अवरोधी प्रजातियॉं हैं।

जवाहर काबुली चना-1, पूसा काबुली 1003, चमत्कार बी.जी. 1053, शुभ्रा, उज्जवल तथा के.ए.के. 2 काबुली चना की नूतन उन्नत प्रजातियॉं हैं।

काबुली चना की औसत उत्पादकता 18-20 कु./ हेक्टेयर है।

  • चना की अच्छी उपज लेने के लिए 20 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश व 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
  • पछेती बुआई की दशा में 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश व 20 कि.ग्रा. गंधक का उपयोग करना चाहिए। बुआई से पहले कूंड़ों में उर्वरक की पूरी मात्रा प्रयोग करना लाभप्रद होता है।
  • जिन क्षेत्रों में जस्ता की कमी पाई जाती है वहॉं 20 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट/ हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए।
  • चने की खड़ी फसल में फूल आने/ फलियाँ बनने की अवस्था में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव से उपज में वृद्धि होती है।

उकठा एवं जड़ विगलन से बचाव के लिए 2.0 ग्राम थीरम, 1.0 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा 3.0 ग्राम थीरम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधन करना चाहिए अथवा ट्राइकोडर्मा दारा 6.0 कि.ग्रा. बीज की दर से शोधन करना चाहिए। ट्राइकोडर्मा राइजोबियम कल्चर के साथ भी मिलाया जा सकता है।

एक पैकेट 250 ग्राम राइजोबियम कल्चर 10 कि.ग्रा. बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होता है। 50 ग्राम गुड़ अथवा चीनी को आधा लीटर पानी में घोल लेना चाहिए घोल को गर्म करके ठण्डा कर इसमें एक पैकेट राइजोबियम कल्चर को अच्छी तरह डण्डे से चलाकर मिला देना चाहिए। बाल्टी में 10 कि.ग्रा. बीज डालकर घोल में मिला देना चाहिए ताकि राइजोबियम कल्चर बीज की सतह पर चिपक जाए। इस प्रकार राइजोबियम कल्चर से सने हुए बीजों को कुछ देर तक छाया में सुखा लेना चाहिए। ध्यान रहे कि राइजोबियम से बीजोपचार के बाद कवकनाशी से बीजशोधन करें।

बुआई का समय

असिंचित क्षेत्रों में                       -    अक्टूबर का द्वितीय सप्ताह

सिंचित क्षेत्रों में                          -    नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा

बीज दर                        

छोटे दाने वाली प्रजाति              -     80-85 कि.ग्रा./हेक्टेयर

बड़े दाने वाली प्रजाति                 -    60-65 कि.ग्रा./हेक्टेयर

चना की बुआई देशी हल के पीछे लगे पोरे से कूंड़ों में अथवा सीड ड्रिल से करनी चाहिए। इसके लिए पंक्ति से पंक्ति के बीच की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे के बीज की दूरी 8-10 सेमी. रखनी चाहिए। सिंचित दशा में पंक्तियों की दूरी 40-45 से.मी. रखनी चाहिए।

बुआई  के 24 घंटे के भीतर पेन्डीमेथलीन की 1.00- 1.25 लीटर मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार का नियन्त्रण हो जाता है। छिड़काव आवश्यकतानुसार एक तिहाई बुआई  के 30 से 35 दिन बाद करना चाहिए।

  • प्रायः चना की खेती असिंचित दशा में की जाती है। यदि पानी की सुविधा हो तो फली बनते समय एक सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।
  • सिंचित क्षेत्रों में पहली सिंचाई, बुआई के 45-60 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय करनी चाहिए।
  • ध्यान रहे, फूल आते समय चना की फसल में सिंचाई कदापि  न करें।
  • गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें।
  •  समय से बुआई करें।
  •  सरसों अथवा अलसी के साथ अन्तः फसल  लें (4:2 या 2:1)
  •  यौन रसायन आकर्षण जाल  लगायें (4-5 प्रति हे.)
  • कीट भक्षी चिड़ियों के बैठने के लिये अण्डे  लगायें (35-40 प्रति हे.)।
  • खेतों का साप्ताहिक भ्रमण एवं निगरानी चना फली भेदक की आर्थिक क्षति स्तर (1-2 सूड़ी प्रति मीटर) आने पर निम्‍न कीटनाशी रसायनों का छिड़काव करें-

निबौली सत् - 5 प्रतिशत

एन.पी.वी. विषाणु  (250 सूड़ी समतुल्य प्रति हे.)

आवश्यकतानुसार - इण्डोसल्फान - 0.07 प्रतिशत

 

जब चना के पौधे लगभग 20-25 से.मी. के हों तब शाखाओं के ऊपरी भाग को तोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से पौधों में शाखाएं अधिक निकलती हैं। फलस्वरूप उपज में वृद्धि होती है। चना की खुटाई, बुआई के 30-40 दिनों में कर लेनी चाहिए तथा 40 दिन बाद नहीं करनी चाहिए।

अंकुरित चना खाने से विटामिन सी, विटामिन ई तथा लौह तत्व प्राप्त होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं।

चना को निम्नलिखित रूपों में मूल्यवर्द्धित किया जा सकता है।

  •   छोले के रूप में
  •   दाल के रूप में
  •   बेसन के रूप में
  •   मीठे एवं नमकीन पकवानों के रूप में

उन्नत प्रजातियों के बीज विभिन्न शोध संस्थानों, कृषि विश्‍वविद्यालयों, बीज एजेन्सियों, ब्लाक कार्यालयों आदि से प्राप्त किए जा सकते हैं। जैसे -

  • प्रदेश बीज विकास निगम के विक्रय केन्द्र
  • विभिन्न कृषि विश्‍वविद्यालय
  • भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर
  • कृषि विज्ञान केन्द्र
  • राष्ट्रीय बीज निगम के विक्रय केन्द्र
  • ब्लाक स्तर पर विकास खण्ड अधिकारी के कार्यालय
  • साधन सहकारी समिति।