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  • भारत में मटर का कुल क्षेत्रफल 7.13 लाख हेक्टेयर है।
  • भारत में मटर का कुल उत्पादन 6.56 लाख टन है।
  • भारत में मटर की कुल उत्पादकता 919 कि.ग्रा./हेक्टेयर है।

   दाने वाली मटर की खेती प्रमुखत: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा और असम में की जाती है ।

आदर्श आई.पी.एफ. 99-25, शिखा, के.पी.एफ. 103, अनर्णा एच.एफ.पी. 4, सपना, प्रकाश, अमन, विकास, आई.पी.एफ.डी. 99-13, स्वाती, आई.पी.एफ.4-9, मालवीय मटर15, एच.यू.डी.पी.15, के.पी.एम.आर.522 तथा के.पी.एम.आर 400 की अधिक उत्पादन देने वाली तथा रोग रोधी प्रजातियॉं हैं ।

मटर की खेती के लिए दोमट एवं हल्की दोमट भूमि अधिक उपयुक्त होती  है

पंक्ति से पंक्ति की दूरी

 बौनी मटर हेतु                                             20-25 से.मी. तथा

 उँचे पौधे वाली प्रजातियों हेतु                            30 से.मी.

  पौधे से पौधे की दूरी                                       10 सं.मी.

  • असिंचित क्षेत्रों में मटर की बुआई का उपयुक्त समय अक्टूबर का प्रथम पखवाड़ा है
  • सिंचित क्षेत्रों में मटर की बुआई अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह से नवम्बर के प्रथम पखवाड़े तक की जा सकती है ।

मटर की विभिन्न प्रजातियों के लिए 30-35 कि.ग्रा. प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है ।

बौनी प्रजाति की मटर की बुआई हेतु 40-45 कि.ग्रा. प्रति एकड़ बीज पर्याप्त होता है ।

बीज जनित रोगों से बचाव हेतु बीज को बोने से पूर्व 2.5 ग्राम थीरम या 2.0 कार्बेन्डाजिम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से  शोधित करना चाहिए ।

बीजोपचार राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने से पूर्व करना चाहिए ।

एक पैकेट 250 ग्राम राइजोबियम कल्चर से 10 कि.ग्रा. बीज को उपचारित करके बोना चाहिए । 50 ग्राम गुड़ अथवा चीनी को आधा लीटर पानी में घोल कर उबाल लें । ठंडा होने पर इस घोल में एक पैकेट राइजोबियम मिला दें। बाल्टी में 10 कि.ग्रा. बीज डालकर अच्छी प्रकार मिलायें ताकि सभी बीजों पर कल्चर का लेप चिपक जाये । उपचारित बीजों को 8-10 घंटे तक छाया में फैला दें और सूखने दें । बीजों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए । बीज उपचार दोपहर के बाद करें जिससे बीज शाम को अथवा दूसरे दिन सुबह बोया जा सके । राइजोबियम कल्चर से उपचारित करने से 4-5 दिन पहले ही कवकनाशियों से बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए।

अधिक पैदावार लेने के लिए 30-40 कि.ग्रा. नत्रजन, 40-60 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20-40 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20-25 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें

मटर में दो सिंचाई महत्वपूर्ण हैं। प्रथम शाखाएँ व फूल निकलने पर तथा दूसरी सिंचाई फलियों की बढ़वार के समय करें ।

बीज एवं पौध विगलन, जड़ गलन तथा उकठा बीज एवं जड़ में लगने वाले रोग है।

चूर्णिल आसिता, रतुआ, तना गलन, झुलसा, तथा पर्ण धब्बे फफूंद जनित रोग है

 

 

  • रोगों से बचाव का सबसे सुगम उपाय है कि रोग रोधी प्रजातियॉं बोयें।
  • संक्रमित खेत में मटर की अगेती बुआई न करें ।
  • बुआई से पूर्व बीजों को थीरम या कार्बेन्डाजिम से  शोधन कर ले ।
  • रोग संक्रमण अधिक होने पर 0.2 मैन्कोजेब अपना जिनेब का छिड़काव 400-800 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से करें।
  • खेत का जल निकास ठीक रखें । 

मटर की फसल को तना मक्खी, मांहू एफिड, मटर का अधफन्दा, सेमी लूपर तथा कटीला फली भेदक एटिपेला हानि पहुॅंचाते हैं।

तना मक्खी या पतसुरंगा या मांहू का प्रकोप हो, वहॉं 2 फोरेट से बीज का उपचार करें अथवा एक कि.ग्रा. फोरेट प्रति हेक्टेयर की दर से खेत की मिट्टी में बुआई से पूर्व मिला दें ।

जहॉं बुआई के समय मिट्टी में दवा न मिल पायी हों, वहॉं फली निकलने की अवस्था में फसल पर 0.04 मोनोक्रोटोफास, 0.07 इण्डोसल्फान, 0.03 डाइमेथोएट, 0.05 मेटासिस्टोक्स अथवा 0.05 मैलाथियान में से जो भी दवा उपलब्ध हो उसका 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें ।

उन्नत  प्रजातियों का बीज विभिन्न शोध संस्थानो, कृषि विश्वविद्यालयों बीज एजेन्सियों आदि से प्राप्त किया जा सकता है । जैसे-

  • प्रदेश बीज विकास निगम के विक्रय केन्द्र
  • विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय
  • कृषि  विज्ञान केन्द्र
  • राष्ट्रीय बीज निगम के विक्रय केन्द्र
  • ब्लाक स्तर पर-विकास खण्ड अधिकारी के कार्यालय
  • साधन सहकारी समिति