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जवाहर मसूर 3, डी.पी.एल. 62, तथा जवाहर मसूर 1, मसूर की उकठा रोधी प्रजातियॉं हैं ।

 

मसूर की छोटे दाने की प्रजाति के लिए 12-16 कि.ग्रा. प्रति एकड़ तथा बड़े दाने की प्रजाति के लिए 20-22 कि.ग्रा. प्रति एकड़ बीज पर्याप्त होता है ।

  • बीज जनित रोगों से बचाव के लिए 2 ग्राम थीरम + 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा 3 ग्राम थीरम  प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से शोधित करना चाहिए
  • बीज शोधन राइजोबियम कल्चर से बीजोपचार करने के 2-3 दिन पूर्व करना चाहिए ।

एक पैकेट 250 ग्राम राइजोबियम कल्चर 10 कि.ग्रा. बीज के लिए पर्याप्त होता है। 50 ग्राम गुड़ अथवा चीनी को आधा लीटर पानी में घोल कर उबाल लेते हैं । ठंडा होने पर इस घोल में एक पैकेट राइजोबियम कल्चर मिला दिया  जाता है । बाल्टी में 10 कि.ग्रा. बीज डालकर अच्छी प्रकार मिलायें ताकि सभी बीजों पर कल्चर का लेप चिपक जाये । उपचारित बीजों को 8-10 घंटे तक छाया में फैला दें और सूखने दें । धूप में नहीं सुखाना चाहिए । बीज उपचार दोपहर के बाद करें जिससे बीज शाम को अथवा दूसरे दिन बोया जा सके ।

  • ट्राइकोडर्मा मृदा में पाया जाने वाला एक ऐसा कवक है जो मृदाजनित उकठा रोग के जीवाणुओं का विनाश करता है अथवा उनको प्रभावहीन बना देता है ।
  • मसूर में कार्बोक्सिन के साथ ट्राइकोडर्मा हार्जियानम को मिलाकर बुआई से पूर्व बीज शोधन करने पर जैव नियंत्रण दक्षता बढ़ जाती है ।

असिंचित क्षेत्रों में अक्टूबर के प्रथम पखवाड़े में तथा सिंचित क्षेत्रों में नवम्बर के द्वितीय सप्ताह तक बुआई अवश्य कर दें ।

पंक्ति से पंक्ति की दूरी 20-25 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 5-8 से.मी. उपयुक्त है ।

मसूर में 15-20 कि.ग्रा. नत्रजन, 30-40 कि.ग्रा. फास्फोरस, 20 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने पर भरपूर फसल मिलती है

खरपतवार नियन्त्रण के लिए बुआई के तुरन्त बाद 4-5 लीटर स्टाम्प अथवा 1 - 1.5 लीटर पैंडीमिथेलीन 30 ई.सी. का 400-500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें  अन्यथा, बुआई के 25-30 दिन बाद एक निकाई / गुड़ाई कर दें ।

सिंचित क्षेत्रों में बुआई के 45-60 दिन बाद हल्की सिंचाई करें । वर्षा होने की स्थिति में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है ।

मसूर की फसल में हानि पहुॅंचाने वाले प्रमुख रोग रतुआ एवं उकठा हैं ।

  • रोगों से बचाव का सबसे सुगम उपाय है कि रोग रोधी प्रजातियॉं बोयें ।  बुआई से पूर्व बीजों को थीरम या कार्बेन्डाजिम से शोधन कर लें । रतुआ रोग के अधिक संक्रमण की दशा में 0.25 प्रतिशत मैन्कोजेब अथवा घुलनशील गंधक 0.3 का छिड़काव करें । उकठा रोग से बचाव के लिए 1 ग्राम वीटावेक्स + 4 ग्राम  ट्राइकोडर्मा फफूॅंदी से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें ।
  • जिस खेत में उकठा का प्रकोप अधिक होता हो, उसमें नये फसल चक्र अपनायें ।
  • रोग ग्रसित खेत में एक वर्ष के अन्तराल पर अलसी की खेती लाभकारी होती है ।
  • गर्मियों में मई-जून में गहरी जुताई कर मिट्टी पलट दें ।                             

मसूर की फसल में कीट प्रकोप कम होता है । उत्तर-पूर्वी और मध्य भारत के क्षेत्रों में कभी-कभी जनवरी के महीने में तापमान सामान्य से अधिक होने पर मॉंहू का प्रकोप होता है । मॉंहू पौधों के तने, पत्तियों और फलियों का रस चूसकर फसल को क्षतिग्रस्त कर देता है । इससे बचाव के लिए डाइमेथोएट 0.03, मेटासिस्टॉस 0.02 अथवा इन्डोसल्फान 0.07 का पानी में घोल बनाकर 500-600 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें ।

मसूर की उन्नत प्रजातियों के बीज विभिन्न शोध संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य की विभिन्न बीज एजेन्सियों आदि से आसानी से प्राप्त कर सकते हैं । जैसे-

  • प्रदेश बीज विकास निगम के विक्रय केन्द्र
  • विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय
  • भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान , कानपुर
  • कृषि  विज्ञान केन्द्र
  • राष्ट्रीय बीज निगम के विक्रय केन्द्र से
  • ब्लॉक स्तर पर विकास- खण्ड अधिकारी के कार्यालय से
  • साधन सहकारी समिति से ।