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सामान्यतः उर्द की खेती दोमट, बलुई दोमट व मटियार भूमि में करने से अच्छी उपज प्राप्त होती है। खरीफ में बुआई के लिए उचित जल निकास वाली भूमि उपयुक्त होती है।

निम्नलिखित प्रजातियॉं पीत चित्तेरी अवरोधी हैं :-

उत्तरा, आई.पी.यू. 02-43, नरेन्द्र उर्द-1, के.यू. 92-1 तथा के.यू. 300 (बसन्तकालीन)  पन्त उर्द-19, पन्त उर्द-35, शेखर-1, शेखर-2, आजाद उर्द-1,

फसल में पीत चितेरी रोग का फैलाव रोकने के लिए सफेद मक्खी (इस रोग का वाहक कीट) का नियंत्रण करें।

उर्द की अच्छी पैदावार के लिए 10 कि.ग्रा. नत्रजन, 45 कि.ग्रा. फास्फोरस तथा  20 कि.ग्रा. गंधक प्रति हेक्टेयर बुआई के समय कूंड़ो में दे देना चाहिए।

 

मूंग के बीजों को बुआई के 2-3 दिन पूर्व कार्बेन्डाजिम अथवा थीरम से 2 ग्राम रसायन प्रति किग्रा. बीज की दर से शोधित करें।

एक पैकेट (250 ग्राम) राइजोबियम कल्चर 10 कि.ग्रा. बीज को उपचारित करने के लिए पर्याप्त होता है। बुआई के 8-10 घंटे पहले 100 ग्राम  गुड़ अथवा चीनी को आधा लीटर पानी में घोल कर उबाल लेना चाहिए। ठंडा होने पर इस घोल में एक पैकेट राइजोबियम कल्चर डण्डे से मिला देना चाहिए। बाल्टी में 10 कि.ग्रा. बीज डालकर अच्छी प्रकार मिला देना चाहिए ताकि राइजोबियम कल्चर बीज की सतह पर चिपक जाए । उपचारित बीजों को छाया में सुखा लेना चाहिए । इन्हें दूसरे दिन भी बोया जा सकता है ।

जायद में बुआई हेतु उर्द के बीज की मात्रा 20-25 कि.ग्रा. / हेक्टेयर संस्तुत की जाती है। खरीफ में 12-15 कि.ग्रा. / हेक्टेयर बीज पर्याप्त होता है।

  • उर्द की फसल क्योंकि लम्बी अवधि की होती है अतः जायद में 15 मार्च तक उर्द की बुआई पूर्ण कर लेनी चाहिए।
  • खरीफ में उर्द की बुआई पूरे जुलाई माह में कर सकते हैं।

                                                                           जायद में                      खरीफ

पंक्ति से पंक्ति की दूरी                         -              20-25 से.मी.              30-35 से.मी.

पौधें से पौधें की दूरी                            -                 5-8 से.मी.                   10 से.मी.

 उर्द की दो पंक्तियों को 60 से.मी. चौड़ी उठी हुई शैय्या पर बुआई करने से खरीफ ऋतु की उर्द की अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

  • जायद में उर्द की बुआई पलेवा करके खेत तैयार होने पर करते हैं जिससे पहली सिंचाई की आवश्यकता बुआई के 20-25 दिनों के बाद होती है। इसके बाद भूमि के अनुसार 2 से 3 सिचाइयों की आवश्यकता पड़ती है।
  • खरीफ में सामान्यतः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
  • मृदा नमी की कमी की अवस्था में 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव फूल आने एवं 10 दिन बाद करने से उपज में वृद्धि होती है। 

उर्द की फसल में मुख्यतः पीत चितेरी, पत्र बुंदकी (सरकोस्पोरा), एन्थ्रेकनोज (रुक्ष रोग) तथा चूर्णी कवक रोग हानि पहुँचाते हैं।

  • उर्द की फसल बोने से पहले ग्रीष्म ऋतु में खेत की गहरी जुताई  सूत्रक्रमि की संख्या को कम करने में मदद करती है।
  • फसल चक्र में धान्य फसलें सूत्रक्रमि की अवस्था को कम करने में सहायता करती हैं।
  • मृदा का कार्बनिक भाग सूत्रक्रमि की समस्या को कम करता है। इसलिये खेत में गोबर खाद का उपयोग व हरी खाद सूत्रक्रमि की समस्या को कम करते हैं।
  • बुआई के समय नीम खली 500 कि0ग्रा0/हेक्टेयर या नीम के बीज का चूर्ण 50 कि0ग्रा0/हेक्टेयर मृदा में मिलाने से सूत्रक्रमि की समस्या में कमी आती है।
  • बुआई से पूर्व बीजों को 2-3 ग्राम कैप्टान या थीरम से प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।
  • फसल में पीत चितेरी रोग प्रकट होने पर मेटासिस्टाक्स 0.1 प्रतिशत या डाइमेथोएट 0.3 प्रतिशत प्रति हेक्टेयर 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर 3-4 बार छिड़काव करें।
  • पत्र बुंदकी के लक्षण प्रकट होने पर कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत या मैन्कोजेब 0.2 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 10-15 दिन के अन्तराल पर दो बार करें।
  • रुक्ष रोग के नियंत्रण के लिए (इण्डोफिल जेड 78) या जिरेम कवकनाशी 2 ग्राम / लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • चूर्णी कवक रोग के नियंत्रण हेतु फसल पर कार्बेन्डाजिम 0.5 ग्राम/लीटर पानी अथवा केरेथेन 1.0 मि.ली./ लीटर पानी का घोल बनाकर 10-15 दिन  के अन्तराल पर दो बार छिड़काव करें।

उर्द की फसल में हानि पहुँचाने वाले कीट और इनकी नियंत्रण विधियॉं निम्नलिखित हैं -

 उर्द की फसल को चूसने वाले कीड़े जैसे- थ्रिप्स, जैसिड और श्वेत मक्खी से बचाने के लिए सर्वप्रथम बीजोपचार करें। इससे 30-40 दिन तक इन कीड़ों का प्रकोप नहीं होता है। इसके लिए 1 किलोग्राम बीज को 3 ग्राम इमिडाक्लोरोपिड से उपचारित करें। फिर 40 दिनों बाद डाईमिथोएट 0.03 प्रतिशत अथवा मेटासिस्टाक्स 0.03 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

उन्नत प्रजातियों के बीज निम्नलिखित स्थानों से प्राप्त किये जा सकते हैं-

  • प्रदेश बीज विकास निगम के विक्रय केन्द्र
  • विभिन्न कृषि विश्वविद्यालय
  • भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर
  • कृषि विज्ञान केन्द्र
  • राष्ट्रीय बीज निगम के विक्रय केन्द्र
  • ब्लॉक स्तर पर विकास- खण्ड अधिकारी के कार्यालय से
  • साधन सहकारी समिति।