चना फली भेदक (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा ) 

चना फली भेदक कीट चना एवं अरहर में लगने वाले कीटों में सबसे महत्वपूर्ण है तथा पूरे भारत में पाया जाता है। हेलिकोवर्पा आर्मिजेरा (हुबनर) एक बहुभक्षी कीट है, जो समान्यतः चना फली भेदक नाम से जाना जाता है। सम्पूर्ण भारत में चना की फसल पर लगने वाला यह प्रमुख कीट है। यह कीट 181 प्रकार की फसलों एवं 48 प्रकार के खरपतवार को खा सकता है। इसका प्रकोप पत्तियों व पुष्पों की अपेक्षा फलियों पर सर्वाधिक होता है। इस कीट की छोटी सूँड़ी फसल की कोमल पत्तियों को खुरच-खुरच कर खाती है व बड़ी  सूँड़ी चना की फलियों में गोलाकार छिद्र बनाकर मुँह अन्दर घुसाकर दाने को खा जाती है। एक सूंड़ी अपने जीवन काल में 30 से 35 दाना खा सकती है। अनुकूल वातावरण में इस कीट का प्रकोप चना की फसल को नष्ट कर देता है।

उत्तर भारत में शरद ऋतु की शुरूआत यानि अक्टूबर के पहले पखवाड़े में चना फली भेदक की सूड़ी  का नुकसान, चना की फसल की पत्तियों पर दिखने लगता है। शरद ऋतु के बाद फरवरी और मार्च में तापमान बढ़ने के साथ साथ चना फली भेदक का प्रकोप फसल पर बढ़ जाता है और फलियों में नुकसान दिखने लगता है।

यह चने की फसल का प्रमुख कीट है तथा उत्तर प्रदेश , राजस्थान , पंजाब, हारियाणा बिहार , आन्ध्र प्रदेश , माहाराष्ट्र , गुजरात  कर्नाटक व मध्य प्रदेश राज्यों में फसल की  20 - 20  प्रतिशत हानि पहुचाता हैं  हालाकि फसल की विपरीत् परिस्थितियों में यह नुकसान 78-80 प्रतिशत तक पहुचा सकता है।

चना फली भेदक का प्रबन्धन

  • जल्दी पकने  वाली प्रजातियों का प्रयोग करें।
  • गर्मियों में गहरी जुताई करने से कीट के  कोषक (प्यूपा) मर जाते हैं। 
  • समय से बुआई करे।  ऐसा करने फसल कीट के प्रकोप से पूर्व ही जाती है। (उत्तरी क्षेत्रों में फरवरी तथा मध्य दक्षिणमें जनवरी - फरवरी में )
  • चने की फसल में सरसों अथवा अलसी 4:1 या 4:2 के साथ अन्तः फसल लें।
  • कीट भक्षी चिड़ियों के बैठने के लिए  टी आकार का अडडे लगायें (35-40 प्रति हे.)।
  • खेतों का साप्ताहिक भ्रमण एंव निगरानी चना फली भेदक कीट संख्या के फैलाव व व्यापकता का आंकलन किया जा सकता है। चना की फसल में यौन रसायन आकर्षण जाल 4-5 प्रति हेक्टेयर   की दर से प्रयोग करें। इस जाल में जब 4-5 चना फली भेदक के नर पतंगें 4-5 रातों तक लगातार दिखें या एक बड़ी सूँडी प्रति 10 पौधा मिलने पर किसानों को तुरंत फसल सुरक्षा उपायों की तैयारी करनी चाहिए। 
  • एच.ए.एन.पी.वी. 250, एल.ई. (डिम्ब समतुल्य)+टीनॉपोल 1% का छिड़काव करें। इसके घोल में 0.5% गुड़ एवं 0.01% तरल साबुन का घोल डालने से क्रमशः कीटों के आकर्षण एवं एन.पी.वी. के पत्तियों पर फैलने में मदद मिलती है।  ध्यान देने योग्य बाजत है कि यह छिडकाव शाम के समय करे इससे एच. ए. एन. पी. वी. सेरज की  अल्ट्रा  वयलेट किरणों से सुरक्षित रहते है।
  • आवश्यकतानुसार-फसल में फली भेदक के प्रबन्धन  के लिये निबौली सत 5 प्रतिशत् प्रयोग करें।
  • चने की फसल में फली भेदक के लिये एन.पी.बी. विषाणु (250 सूड़ी समतुल्य प्रति हेक्टअर) अवश्य प्रयोग करें।
  • संश्लेषित रसायनों प्रभावशाली एवं आसानी से उपलब्ध हैं किन्तु इन रसायनों का प्रयोग तभी करना चाहिए जब चना फली भेदक का प्रकोप अत्यधिक हो और ऊपर वर्णित किसी भी अन्य विधि ये इस कीट का नियेत्रण न हो और आर्थिक क्षति होने का अनुमान हो। संस्तुति कीटनाशी रसायन इस प्रकार हैं
  •  नोराल्यूरान 10 प्रतिशत इी. सी. 700 मिली प्रति हेक्टेयर
  • क्लोरन्ट्रानिलीप्रोल 18.5 प्रतिशत एस. सी. 125 मिली प्रति हैक्टेयर
  • मोनोक्रोटोफॉम 36 प्रतिशत एस. एल. 625 मिली प्रति हेक्टेयर
  • क्लोरोपायरीफॉस 20 प्रतिशत ई.सी. 2500 मिली प्रति हेक्टेयर

 

हारियाणा पंजाब के रजस्थान राज्यों में दीमक का प्रकोप अधिक देखने को मिलता है जहॉ का मौसम तुलनात्मक रूप से अधिक शुष्क होता है मध्य प्रदेश व बिहार में भी दीमक के कारण काफी स्क्षति होजी है।